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Monday, October 27, 2014

लोक आस्था और धार्मिक सौहार्द का महापर्व छठ

लोक आस्था का पर्व छठ बिहार और उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व में साफ-सफाई का विशेष तौर पर ख्याल रखा जाता है। देश-विदेश में जहां कहीं भी बिहार और यूपी के लोग रहते हैं, वे छठ पर्व जरूर मनाते हैं। बदलते समय के साथ-साथ यह पर्व धार्मिक सौहार्द का प्रतीक बन गया है। मुस्लिम धर्म के लोग भी बड़ी संख्या में इस पर्व को श्रद्धा पूर्वक व विधि-विधान से मनाते हैं।

इस बार सांध्य कालीन अर्घ्य 29 अक्टूबर और प्रात: कालीन अर्घ्य 30 अक्टूबर को है। इससे पहले छठ व्रती खरना करते हैं। 28 अक्टूबर 2014 को खरना है और इसमें व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं तथा उसके बाद अगले दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने और फिर प्रात:कालीन सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूजा करने के बाद ही प्रसाद के साथ व्रत खोलते हैं।

छठ व्रत दीपावली के छठे दिन मनाया जाता है। यह व्रत साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत मास और फिर कार्तिक मास में। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को बड़े पैमाने पर यह पर्व मनाया जाता है। अथर्ववेद में इस व्रत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। छठ व्रत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लाभकारी माना गया है। इस व्रत को सच्चे मन से करने वालों की हर मनोकामनायें पूरी होती है। इस व्रत के बारे में ऐसी पौराणिक मान्यता है कि महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की अराधना और पुत्र कर्ण के जन्म के समय से ही इसे मनाया जाता है।

छठ पर्व में व्रती आसपास के नदी-तालाब में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। जहां नदी या कोई पोखर यानी तालाब नहीं है वहां लोग अपने घर के आगे ही साफ-सफाई करके एक गड्ढ़ा बनाते हैं और उसमें साफ जल भरते हैं, फिर व्रती उसमें खड़ा होकर सूर्य देव की अराधना करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठ देवी सूर्य देव की बहन है। जीवन के लिए जल और यूर्य की किरणों की महत्ता को देखते हुए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है।इस व्रत को महिला या पुरुष कोई भी कर सकता है। यह व्रत काफी कठोर माना जाता है। इसमें व्रती को खरना के दिन भगवान का प्रसाद ग्रहण करके फिर अगले दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद प्रात:कालीन सूर्य को अर्घ्य देकर घर पर पूजा करने के बाद प्रसाद ग्रहण करना पड़ता है।

इस व्रत में केला, ईंख, मूली, नारियल, सुथनी, अखरोट, बादाम, खजूर (ठेकुआ) का बड़ा महत्व है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्थी तिथि से इस व्रत का आरंभ होता है। व्रती नहा-धोकर अरबा चावल, लौकी और चने की दाल बिना लहसुन-प्याज के ग्रहण करते हैं और फिर अगले दिन व्रती बिना अन्न-जल ग्रहण के रहते हैं और शाम को खरना का प्रसाद बनता है। प्रसाद में गुड़ का खीर, ठेकुआ और कसार तैयार किया जाता है। जिनके घर में छठ व्रत नहीं होता है उन्हें भी इस अवसर पर प्रसाद दिया जाता है। इसके अगले दिन व्रती नदी-तालाब में साफ जल में खड़े होकर अस्ताचल गामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। फिर शाम को पांच या सात ईंख (गन्ना) के बीच में नए कपड़े (ज्यादातर पीला) चंदवा से बांधकर उसके नीचे कोसी सजाया जाता है और इसके नीचे दीप जलाया जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी तरह के रोगों से छुटकारा मिलता है और हर मनोकामनायें पूरी होती है। इस अवसर पर घर के सभी सदस्य छठ घाट पर साफ-सफाई करते हैं और नए वस्त्र पहनते हैं। बच्चों की खुशियां तो देखते ही बनती है। इसे मनाने के संबंध में कई लोक कथायें प्रचलित है।

Source: RB

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