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Monday, April 14, 2014

विलुप्ता के कगार पर जूड़शीतल

आधुनिकता के इस दौड़ में लोक आस्था का पर्व जूड़शीतल विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। शनिवार को छिटपुट स्थानों पर ही इस पर्व को लेकर उत्साह देखा गया। वहीं आम तौर पर सिर्फ खानपान तक ही यह पर्व सिमटा रहा। मालूम हो कि सतुआनी व जूड़शीतल अन्य पर्व के तरह धूमधाम के साथ मनाने के लिए घर-घर पूर्व से तैयारियां हो जाती थी और पर्व के दिन लोग पुरानी परंपरा को निभाते हुए बड़े बुजुर्ग जहां सूर्योदय पूर्व परिवार के सदस्यों के माथे पर ठंडे जल डालकर शीतलता रहेन का आशीर्वाद देते। वहीं महिलाएं आंगन लीप-पोतकर पर्व के अनुसार पकवान बनाकर चूल्हे पर चढ़ाकर मिट्टी धूल खेलने की होड़ लग जाती। युवाओं द्वारा सड़कों पर मिट्टी धूल फेंकने की डर से इस दिन चालक वाहन चलाने से परहेज रखते थे। लेकिन इस बार वैसा उत्साह लोगों में नहीं देखा गया। प्रतिदिन की भांति सड़कों पर वाहनों का परिचालन दिन भर चलता रहा। एक भी व्यक्ति मिट्टी धूल खेलते व फेंकते नहीं देखे गए। कुल मिलाकर जूड़शीतल का पर्व सुबह में बुजुर्गो के आशीर्वाद दिये जाने की परंपरा व संबंधित पकवान व खान पान तक ही सिमट कर रह गया।

सोर्स: जागरण

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