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Tuesday, August 27, 2013

Vidyapati Geet जाइत पेखलि नहायलि गोरी

जाइत पेखलि नहायलि गोरी।
कल सएँ रुप धनि आनल चोरी।।
केस निगारहत बह जल धारा।
चमर गरय जनि मोतिम-हारा।।
तीतल अलक-बदन अति शोभा।
अलि कुल कमल बेढल मधुलोभा।।
नीर निरंजन लोचन राता।
सिंदुर मंडित जनि पंकज-पाता।।
सजल चीर रह पयोधर-सीमा।
कनक-बेल जनि पडि गेल हीमा।।
ओ नुकि करतहिं जाहि किय देहा।
अबहि छोडब मोहि तेजब नेहा।।
एसन रस नहि होसब आरा।
इहे लागि रोइ गरम जलधारा।।
विद्यापति कह सुनहु मुरारि।
वसन लागल भाव रुप निहारि।।


अर्थ

रास्ते में चलते-चलते एक सद्य: स्नाता सुन्दरि को देखा। न जाने इस नायिका ने कहाँ से यह रुप (विलक्षण) चुराकर लाई है? गीले केस (बाल) को निचोड़ते ही जल का धार टपकने लगा। चँवर से मानो मोती का हार चू रहा हो। भीगे हुए अलक के कारण मुखमण्डल अति सुन्दर (भव्य) लग रहा था, जैसे रस का लोभी भ्रमर मानो कमल को चारों ओर से घेर लिया है। काजल सही ढ़ंग से साफ हो गया था। आंखें एकदम लाल थी। ऐसा लग रहा था जैसे कमल के पत्ते पर किसी ने मिन्दुर घोल दिया है। भीगा वस्र स्तन के किनारे में था। लग रहा था कि जैसे सोने के बेल को पाल
(सर्दी) मार दिया हो। वह (वस्र) छिपा-छिपा कर अपने शरीर को देख रही थी, जैसे अभी-अभी यह स्तन मुझे अलग कर देगा, मेरा स्नेह छोड़ देगा। अब मुझे ऐसा रस नहीं मिलेगा, इसीलिए शायद शरीर पर के बहते जल के धार रो रहा था। महाकवि विद्यापति कहते हैं कि हे कृष्ण, सौन्दर्य को देखकर वस्र को नायिका से स्नेह हो गया था।

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