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Friday, August 23, 2013

Vidyapati Geet कि कहब हे सखि आजुक रंग

कि कहब हे सखि आजुक रंग।
सपनहिं सूतल कुपुरुप संग।।
बड सुपुक्ख बलि आयल घाइ।
सूति रहल मोर आंचर झंपाइ।।
कांचुलि खोलि आंलिगल देल।
मोहि जगाय आपु जिंद गेल।
हे बिहि हे बिहि बड दुम देल।।
से दुख हे सखि अबहु न गेल।।
भनई विद्यापति एस रश इंद।
भेक कि जान कुसुम मकरंद।।


अर्थ

हे सखि, आज के रंग-ढ़ंग (प्रीति और अभिसार) के बारे में क्या बताऊँ! एक अनाड़ी, नासमझ और अनुभवहीन पुरुष मेरे सपने में मेरे पास आया और सो गया। वह पुरुष वैसे तो मेरे पास ठीक-ठाक ही आया था और मेरे आँचल (साड़ी) से मूँह ढ़ककर सो गया। कर्वप्रथम तो वह मेरे अंगिया (ब्लाउज) खोल दिया और फिर अपने बाहुपास में समेह लिया। इसके बाद क्या बताऊँ सखी.......वह मुर्ख (!) मुझे तो जगा दिया परन्तु स्वयं शान्त हो गया। हे भगवान, बाप रे बाप, मुझे कितना भयंकर दुख दे दिया। सखी! सच कहूँ तो वह दुख मैं अभी तक नहीं भूली हूँ। महाकवि विद्यापति कहते है कि यह रस नहीं रस का आभास है। फूल और पराग का मर्म मेढ़क भला क्या समझ सकता है।

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